पहला विकल्प यह मानता है कि नियामक सीधे एक प्रोग्रामेबल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से रिज़र्व जारी करेगा। एक वैकल्पिक प्रस्ताव यह है कि ईसीबी की मौजूदा रियल-टाइम ग्रॉस सेटलमेंट प्रणाली को बरकरार रखा जाए। इसके बाद इसे डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी (DLT) प्लेटफ़ॉर्म से जोड़ा जाएगा। इस परिदृश्य में स्वयं रिज़र्व टोकनाइज़ नहीं किए जाएंगे, लेकिन दोनों प्रणालियाँ आपस में जुड़ी होंगी।
तीसरा दृष्टिकोण ईसीबी में रखे गए रिज़र्व की टोकनाइज़ेशन का प्रस्ताव करता है, जिसके बदले पूरी तरह उन्हीं से समर्थित सेटलमेंट टोकन जारी किए जाएंगे। ये टोकन निजी दावे होंगे, न कि सीधे ईसीबी द्वारा जारी किए गए दावे। आवश्यक विधायी कदम अपनाए जाने की स्थिति में डिजिटल यूरो को 2029 के मध्य में लॉन्च किया जा सकता है।