निवेश और सेवा व्यापार विभाग के प्रमुख हुआन मार्केट्टी ने कहा कि बाधा तकनीक में नहीं है। मुख्य कारण विनियमन और पर्याप्त नियामक-वैधानिक ढांचे का अभाव है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय भुगतानों के कुल दायरे में इनकी हिस्सेदारी केवल 3% है।

विकासशील देशों को स्टेबलकॉइनों के लागू होने से सबसे अधिक लाभ मिल सकता है, क्योंकि इससे धन-प्रेषण शुल्क कम हो सकते हैं। हालांकि, मार्केट्टी ने कहा कि इन्हीं देशों में उनके उपयोग को बढ़ावा देने वाले नियामक ढांचे सबसे कम विकसित हैं। सर्वेक्षण में शामिल 28 क्षेत्रों में से केवल 11 (39%) ने स्टेबलकॉइनों के लिए अपने नियामक ढांचे को अंतिम रूप दिया है।

WTO ने 5 समस्या-क्षेत्रों की पहचान की है, जिन्हें स्टेबलकॉइनों के उपयोग से सुधारा जा सकता है। इनमें ट्रांसफर लागत कम करना, गति बढ़ाना और उपलब्धता में सुधार शामिल है। इसके अलावा, टोकन पारदर्शिता बढ़ा सकते हैं और कुछ हद तक मुद्रा-नियंत्रण प्रतिबंधों के प्रभाव को कम कर सकते हैं।